Tuesday, 16 April 2013

ग़ज़ल 1 9 5 ( करें प्यार सब लोग खुद जिंदगी से )

करें प्यार सब लोग खुद ज़िंदगी से ,
हुए आप अपने से क्यों अजनबी से !
कभी गुफ़्तगू आप अपने से करना ,
मिले एक दिन आदमी आदमी से !
खरीदो कि बेचो ,है बाज़ार दिल का ,
मगर सब से मिलना यहां, बेदिली से !
हमें और पीछे धकेले गये सब ,
शुरूआत फिर फिर हुई आखिरी से !
बताओ तुम्हें और क्या चाहिए अब ,
यही , लोग कहने लगे बेरुखी से !
कहीं और जाकर ठिकाना बना लो ,
यही , रौशनी ने कहा तीरगी से !
पड़े जाम खाली सभी आज तनहा ,
बुझाओ अभी प्यास को तशनगी से !

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