Wednesday, 10 April 2013

ग़ज़ल 1 9 4 ( फूल जैसे लोग इस जमाने में )

फूल जैसे लोग इस ज़माने में ,
सुन रखे होंगे किसी फ़साने में !
वक़्त लगता है उसे भुलाने में ,
दर्द बढ़ता दास्तां सुनाने में !
छेड़ कर बुझती हुई चिंगारी इक  ,
खुद लगा ली आग आशियाने में !
कोशिशें उसने हज़ार कर देखीं ,
लुत्फ़ आया और रूठ जाने में !
तोड़ डाली खेल खेल में दुनिया ,
फिर ज़माना लग गया बसाने में !
आप कितना दूर - दूर रहते हैं ,
मिट गये हम दूरियां मिटाने में !
छोड़नी दुनिया हमें पड़ी तनहा ,
अहमियत अपनी उन्हें बताने में !


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