Monday, 8 April 2013

ग़ज़ल 1 9 3 ( सुन जमाने बात दिल की खुद बताना चाहता हूँ )

सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं ,
पौंछकर आंसू सभी , अब मुस्कुराना चाहता हूं !
ज़िंदगी भर आपने समझा मुझे अपना नहीं पर ,
गैर होकर आपको अपना बनाना चाहता हूं !
दोस्तों की बेवफ़ाई भूल कर फिर आ गया हूं ,
बेरहम दुनिया को फिर से आज़माना चाहता हूं !
किस तरफ जाना तुझे ,अब रास्ते तक पूछते हैं ,
बस यही कहता हूं उनको इक ठिकाना चाहता हूं !
आप मत देना सहारा ,जब कभी गिरने लगूं मैं ,
टूट जाऊं ,बोझ खुद इतना उठाना चाहता हूं !
आपसे कैसा छिपाना ,जानता सारा ज़माना ,
सोचता हूं आज लेकिन क्यों दिखाना चाहता हूं !
नाचते सब लोग तनहा तान मेरी पर यहां हैं ,
आज कठपुतली बना तुमको नचाना चाहता हूं !

1 comment:

sunita agarwal said...

बेरहम दुनिया को फिर से आज़माना चाहता हूं !
अच्छी ग़ज़ल ।