Sunday, 7 April 2013

सभी का जिसका कोई नहीं था ( कविता ) 9 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सभी का जिसका कोई नहीं था ( कविता )

पार्क में सैर करते करते ,
हुई थी उससे जान पहचान ,
मिल जाता था अक्सर सुबह शाम ,
उसके होटों पे खिली रहती थी ,
बहुत ही प्यारी सी इक मुस्कान।

बातें बहुत अच्छी सुनाता था हमेशा ,
अपने सभी हैं चाहते उसको ,
हमें बस यही था बताता हमेशा ,
साथ साथ चलते राह लगती थी प्यारी ,
रहता भी वो मुस्कुराता हमेशा।

घर का कभी कभी दोस्तों का ,
कभी ज़िक्र नातों रिश्तों का ,
जब भी करता बहुत खुश होता ,
मुहब्बत के भी था किस्से सुनाता ,
खूबसूरत दुनिया से वो था आता।

सुना जब नहीं अब रहा बीच अपने ,
करने थे पूरे उसे ख्वाब कितने ,
पूछ कर किसी से उसका ठिकाना ,
गए जब वहां तभी सबने जाना ,
नहीं कोई उसका सारी दुनिया में ,
बातें सब उसकी थी कुछ झूठे सपने।

हमें नज़र आएंगे जब जब भी मेले ,
नहीं साथ होगा कोई बस हम अकेले ,
हम भी उसकी बातें दोहराया करेंगे ,
कहानी उसी की सुनाया करेंगे।  
                      ( शीर्षक : : अनदेखे सुहाने स्वप्न  )

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