Wednesday, 10 April 2013

ग़ज़ल 1 9 4 ( फूल जैसे लोग इस जमाने में ) - लोक सेतिया "तनहा"

फूल जैसे लोग इस ज़माने में - लोक सेतिया "तनहा"

फूल जैसे लोग इस ज़माने में ,
सुन रखे होंगे किसी फ़साने में।

वक़्त लगता है उसे भुलाने में ,
दर्द बढ़ता दास्तां सुनाने में।

छेड़ कर बुझती हुई चिंगारी इक  ,
खुद लगा ली आग आशियाने में।

कोशिशें उसने हज़ार कर देखीं ,
लुत्फ़ आया और रूठ जाने में।

तोड़ डाली खेल खेल में दुनिया ,
फिर ज़माना लग गया बसाने में।

आप कितना दूर - दूर रहते हैं ,
मिट गये हम दूरियां मिटाने में।

छोड़नी दुनिया हमें पड़ी तनहा ,
अहमियत अपनी उन्हें बताने में। 


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