Thursday, 28 March 2013

ग़ज़ल 1 8 9 ( मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल )

मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल ,
कहां संभला ,संभाले से किसी का दिल !
भुला बैठा , तुम्हारी बेवफ़ाई जो ,
हुआ बर्बाद फिर फिर बस उसी का दिल !
तुम्हें दिल दे दिया हमने ,तुम्हारा है ,
नहीं समझो उसे तुम अजनबी का दिल !
मनाया लाख इस दिल को नहीं माना ,
लगा लगने पराया सा कभी का दिल !
हुए थे पार कितने तीर उस दिल से ,
मिला इक दिन मुहब्बत की परी का दिल !
बहाये अश्क दोनों ने बहुत मिलकर  ,
मिला जब ज़िंदगी से ज़िंदगी का दिल !
किसी की इक झलक आई नज़र तनहा ,
बड़ा बेचैन रहता है तभी का दिल !

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