Friday, 22 March 2013

ग़ज़ल 1 8 7 ( हमें खुद से शिकायत क्या करें हम )

हमें खुद से शिकायत क्या करें हम ,
है चुप रहने की आदत क्या करें हम !
बड़े मगरूर देखे हुस्न वाले ,
किसी से फिर मुहब्बत क्या करें हम !
लिखे हर दिन नहीं भेजे किसी को ,
जला डाले सभी ख़त क्या करें हम !
हमारा जुर्म बोला सच हमेशा ,
मिली ज़िल्लत ही ज़िल्लत क्या करें हम !
बहुत तनहाईयां लाती है दौलत ,
ज़माने भर की दौलत क्या करें हम !
बड़ा है शहर लेकिन लोग छोटे ,
हमें लगती है आफ़त क्या करें हम !
ये दिल उनको नहीं देना था तनहा ,
लगी भोली वो सूरत क्या करें हम !

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