Tuesday, 19 March 2013

ग़ज़ल 1 8 6 ( ये कैसे समझदार होने लगे सब )

ये कैसे  समझदार होने लगे सब ,
दिया छोड़ हंसना ,हैं  रोने लगे सब !
लगे प्यार करने ,समझ कर तिजारत ,
जो पाया था ,उसको भी खोने लगे सब !
किसी पर कभी तुम भरोसा न करना ,
नहीं अब बचाते ,  डुबोने लगे सब  !
जिन्हें मुझसे सुननी थी मेरी कहानी ,
सुनाता रहा मैं , वो सोने लगे सब  !
सभी आसमां के चमकते सितारे ,
हमें  दुल्हनों के बिछौने लगे सब !
किया रोज़ दावा , कभी हम न रोते ,
मिला ज़ख्म ,पलकें भिगोने लगे सब !
भुला कर मुहब्बत ,मिला क्या है तनहा ,
यहां फूल तक शूल होने लगे सब !

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