Friday, 15 March 2013

ग़ज़ल 1 8 5 ( जमाना झूठ कहता है जमाने का है क्या कहना )

ज़माना झूठ कहता है ,ज़माने का है क्या कहना ,
तुम्हें खुद तय ये करना है ,किसे क्यों कर खुदा कहना !
जहां सूरज न उगता हो ,जहां चंदा न उगता हो ,
वहां करता उजाला जो ,उसे जलता दिया कहना !
नहीं कोई भी हक देंगे ,तुम्हें खैरात बस देंगे ,
वो देने भीख आयें जब ,हमें सब मिल गया कहना !
तुम्हें ताली बजाने को ,सभी नेता बुलाते हैं ,
भले कैसा लगे तुमको ,तमाशा खूब था कहना !
नहीं जीना तुम्हारे बिन ,कहा उसने हमें इक दिन ,
उसे चाहा नहीं लेकिन ,मुहब्बत है पड़ा कहना !
हमें इल्ज़ाम हर मंज़ूर होगा आपका लेकिन ,
मेरी मज़बूरियां समझो अगर मत बेवफ़ा कहना !
हमेशा बस यही मांगा ,तुम्हें खुशियां मिलें "तनहा" ,
हुई पूरी तुम्हारे साथ मांगी हर दुआ कहना !

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