Thursday, 14 March 2013

ग़ज़ल 1 8 4 ( उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं )

उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं ,
जहां ख़त्म होते सभी के गिले हैं !
है रस्ता वही और मंज़िल वही है ,
मुसाफिर नये ,कुछ नये काफ़िले हैं !
मिले रोज़ कांटे जिन्हें नफरतों से , 
हुआ प्यार जब फूल कितने खिले हैं !
नया दौर कहता मुझे प्यार करना ,
सदा टूटते सब पुराने किले हैं !
नहीं घास को कुछ हुआ आंधियों में  ,
जो ऊंचे शजर थे ,वो जड़ तक हिले हैं !
मुहब्बत में मिलती रहेंगी सजायें  ,
रुके कब भला इश्क के सिलसिले हैं !
कहा आज उसने कहो कुछ तो "तनहा" ,
था कहना बहुत कुछ ,मगर लब सिले हैं !

No comments: