Monday, 11 March 2013

ग़ज़ल 1 8 3 ( कहीं दिल के है पास लगता है )

कहीं दिल के है पास लगता है ,
ये दिल फिर क्यों उदास लगता है !
बहुत प्यासा , उसे पिला देना ,
समुन्दर की वो प्यास लगता है !
अंधेरी रात जब भी आती है ,
वही मुखड़ा उजास लगता है !
जिसे ख़बरों में आ गया रहना ,
ज़माने भर को ख़ास लगता है !
न तो चन्दरमुखी , न है पारो ,
अकेला देवदास लगता है !
उसे तोड़ा बहुत ज़माने ने ,
नहीं टूटी है आस लगता है !
हुये जब दूर चार दिन "तनहा"  ,
हमें इक दिन भी मास लगता है !

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