Saturday, 9 March 2013

ग़ज़ल 1 8 2 ( बात हर इक छुपाने लगा मैं )

बात हर इक छुपाने लगा मैं ,
कुछ हुआ ,कुछ बताने लगा मैं !
देखकर जल गये लोग कितने ,
जब कभी मुस्कुराने लगा मैं !
सब पुरानी भुलाकर के बातें ,
दिल किसी से लगाने लगा मैं !
मयकदे से पिये बिन हूं लौटा ,
किसलिये  डगमगाने लगा मैं !
बात करने लगे दिलजलों की ,
फिर उन्हें याद आने लगा मैं !
बेवफ़ा खुद मिलाता है नज़रें ,
और नज़रें झुकाने लगा मैं !
ख़त जलाकर सभी आज "तनहा" ,
हर निशां तक मिटाने लगा मैं !

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