Saturday, 2 March 2013

ग़ज़ल 1 8 0 ( सब कहीं सर झुकाना न आया )

सब कहीं सर झुकाना न आया ,
हर खुदा को मनाना न आया !
हम वफ़ाएं निभाते हमेशा  ,
बात झूठी बनाना न आया !
लोग जीने लगें ज़िंदगी को ,
हाय क्यों वो ज़माना न आया !
प्यार उसने हमारा भुलाया ,
पर हमें कुछ भुलाना न आया !
दर्द दुनिया से सारे छुपाये  ,
बस उन्हीं से छुपाना न आया !
और कोई नहीं बीच अपने ,
इक भरोसा दिलाना न आया !
हाथ हमने बढ़ाया था "तनहा" ,
हाथ उनको मिलाना न आया !

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