Monday, 18 March 2013

चले जा रहा ( कविता ) 8 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मंज़िल है किधर ,
मैं किधर जा रहा हूं ,
नहीं जानता कुछ ,
पर चले जा रहा हूं ,
मैं चले जा रहा हूं !
जानता हूं लेकिन ,
अनजान बन गया हूं ,
किसे कहूं ,
कैसे कहूं ,
विवशता अपनी ,
विडंबना कैसी ,
बताउं मैं किसको ,
जाना है उधर  ,
और मैं इधर जा रहा हूं ! !
मालूम सब मुझे ,
क्या क्या क्यों है करना ,
पर अपने आप को ,
स्वयं ही बस छले जा रहा हूं !
सोचता नहीं हूं ,
क्यों किधर जा रहा हूं ,
चले जा रहा ,
बस चले ही जा रहा हूं ! !
ज़रूरी है करना ,
करने की है चाह भी  ,
करना तो होगा मुझको ,
सबह शाम खुद से ,
कहे जा रहा हूं !
चले जा रहा हूं ! !
करता रहा वही सब अभी तक ,
जो जो नहीं था करना ,
किया था कल भी ,
आज भी किये जा रहा हूं  ,
नहीं करूंगा सोचकर ,
खुद ही मुकर रहा हूं !
फिर किये जा रहा हूं !
मैं चले जा रहा हूं ! !
सब है वही पुराना ,
कुछ भी नया नहीं है .
अच्छा है न ही बुरा है ,
समय  बचा नहीं है ,
बर्बाद वक़्त अपना ,
किये जा रहा रहा हूं ,
जीते नहीं हैं जैसे ,
जी रहा हूं मैं  ऐसे ,
खुद से और होता  ,
परे जा रहा हूं !
चले जा रहा हूं ,
बस चले जा रहा हूं ! !

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