Tuesday, 26 March 2013

ऐसी होली फिर से आये ( कविता ) 8 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

एक घर है , बहुत प्यारा हमारा ,
कोई अकेला नहीं न है बेसहारा ,
खुला है आंगन , दिल भी खुले हैं ,
और ऊपर बना हुआ इक चौबारा !
मिल जुल खेलते सारे हैं होली ,
है मीठी कितनी लगती घर की बोली ,
पड़ा झूला भी अंगने के पेड़ पर इक ,
भैया भाभी सभी की भाती ठिठोली !
गांव सारा लगे अपना सभी को ,
चाचा चाची ,मौसी नानी ,सहेली ,
सभी को आज जा कर मिलना ,
मनानी है सभी के संग ये होली !
सभी अपने लोग, घर सब अपने ,
खिलाते हैं खुद बना घर की मिठाई ,
गिला शिकवा था गर भुलाकर ,
लगे फिर से गले बन भाई भाई !
प्यार से रंग उसको भी लगाया ,
हमारा रंग खूब उसको था भाया ,
शरमा गई सुन प्यार की बात ,
सर हां में लेकिन उसने झुकाया !
नहीं झूठ ,न छल कपट किसी में ,
जो कहता कोई सब मान लेते ,
मिलजुल कर बना लेते सभी काम ,
हो जाता जो मिलकर के ठान लेते !
कभी फिर से वही पहले सी होली ,
आ जाये कभी यही सपना है देखा ,
हटी हो आंगन की सभी दिवारें ,
मिटे हर मन में खिंची हुई रेखा !

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