Sunday, 31 March 2013

ग़ज़ल 1 9 0 ( खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ) - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ,
हो जीना मौत से बदतर ,न इतनी बेबसी देता।

मुहब्बत दे नहीं सकते अगर ,नफरत नहीं करना ,
यही मांगा सभी से था ,नहीं कोई यही देता।

नहीं कोई भी मज़हब था ,मगर करता इबादत था ,
बनाकर कश्तियां बच्चों को हर दिन कागज़ी देता।

कहीं दिन तक अंधेरे और रातें तक कहीं रौशन ,
शिकायत बस यही करनी, सभी को रौशनी देता।

हसीनों पर नहीं मरते ,मुहब्बत वतन से करते ,
लुटा जां देश पर आते ,वो ऐसी आशिकी देता।

हमें इक बूंद मिल जाती ,हमारी प्यास बुझ जाती ,
थी शीशे में बची जितनी ,पिला हमको वही देता।

कभी कांटा चुभे ऐसा ,छलकने अश्क लग जाएं ,
चले आना यहां "तनहा" है फूलों सी नमी देता। 

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