Thursday, 14 March 2013

ग़ज़ल 1 8 4 ( उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं )

 उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं - लोक सेतिया "तनहा"

उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं ,
जहां ख़त्म होते सभी के गिले हैं।

है रस्ता वही और मंज़िल वही है ,
मुसाफिर नये ,कुछ नये काफ़िले हैं।

मिले रोज़ कांटे जिन्हें नफरतों से , 
हुआ प्यार जब फूल कितने खिले हैं।

नया दौर कहता मुझे प्यार करना ,
सदा टूटते सब पुराने किले हैं।

नहीं घास को कुछ हुआ आंधियों में  ,
जो ऊंचे शजर थे , वो जड़ तक हिले हैं।

मुहब्बत में मिलती रहेंगी सजायें  ,
रुके कब भला इश्क के सिलसिले हैं।

कहा आज उसने कहो कुछ तो "तनहा" ,
था कहना बहुत कुछ , मगर लब सिले हैं।

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