Monday, 11 March 2013

ग़ज़ल 1 8 3 ( कहीं दिल के है पास लगता है ) - लोक सेतिया "तनहा"

कहीं दिल के है पास लगता है - लोक सेतिया "तनहा"

कहीं दिल के है पास लगता है ,
ये दिल फिर क्यों उदास लगता है।

बहुत प्यासा , उसे पिला देना ,
समुन्दर की वो प्यास लगता है।

अंधेरी रात जब भी आती है ,
वही मुखड़ा उजास लगता है।

जिसे ख़बरों में आ गया रहना ,
ज़माने भर को ख़ास लगता है।

न तो चन्दरमुखी , न है पारो ,
अकेला देवदास लगता है।

उसे तोड़ा बहुत ज़माने ने ,
नहीं टूटी है आस लगता है।

हुये जब दूर चार दिन "तनहा"  ,
हमें इक दिन भी मास लगता है। 

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