Saturday, 9 March 2013

ग़ज़ल 1 8 2 ( बात हर इक छुपाने लगा मैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

बात हर इक छुपाने लगा मैं - लोक सेतिया "तनहा"

बात हर इक छुपाने लगा मैं ,
कुछ हुआ ,कुछ बताने लगा मैं।

देखकर जल गये लोग कितने ,
जब कभी मुस्कुराने लगा मैं।

सब पुरानी भुलाकर के बातें ,
दिल किसी से लगाने लगा मैं।

मयकदे से पिये बिन हूं लौटा ,
किसलिये  डगमगाने लगा मैं।

बात करने लगे दिलजलों की ,
फिर उन्हें याद आने लगा मैं।

बेवफ़ा खुद मिलाता है नज़रें ,
और नज़रें झुकाने लगा मैं।

ख़त जलाकर सभी आज "तनहा" ,
हर निशां तक मिटाने लगा मैं। 

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