Saturday, 2 March 2013

ग़ज़ल 1 8 0 - सर कहीं पर झुकाना न आया ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा"

  सर कहीं पर झुकाना न आया ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया

सर कहीं पर झुकाना न आया
उस खुदा को मनाना न आया।

लोग नाराज़ हों चाहे कितने
झूठ को सच बताना न आया।

हर किसी को भरोसा था सब पर
फिर वो गुज़रा ज़माना न आया।

हमको सबने भुलाया है अब तक
पर हमें भूल जाना न आया।

ज़ख्म अपने  छुपाये हैं हमने
चारागर को दिखाना न आया।

दोस्त कोई न कोई है दुश्मन
कुछ भी हमको बनाना न आया।

जां उसी की अमानत है "तनहा"
हर किसी पर लुटाना न आया।

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