Wednesday, 20 March 2013

होगा संभव पांचवें युग में ( हास्य व्यंग्य कविता ) 1 5 भाग तीन

होगा संभव पांचवें युग में ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

मिल कर सभी देवता गये प्रभु के पास ,
सोच सोच कर जब हुए देवगण उदास।

कैसे खुश हों उनकी पत्नियां ,समझ नहीं आता ,
सफल कभी न हो पाए किए कई प्रयास।

जाकर किया प्रभु से अपना वही सवाल ,
बतलाओ प्रभु हो जाये ये हमसे कमाल।

सब है देव पत्नियों को मिलता , नहीं प्रसन्न कोई ,
पूरी कर पाते नहीं  , देव तक उनकी आस।

विनती सुन देवों की प्रभु को समझ न आया ,
कोई भी हल समस्या का जाता नहीं बताया।

सुनो देवो बात मेरी , सारे दे कर ध्यान ,
बदल नहीं सकता कोई विधि का कभी विधान।

जो खुश पत्नी को कर सकता , वो होगा कोई महान ,
सच मानो नहीं कर पाया ये मैं , खुद भगवान।

असम्भव कार्य है करना मत कभी भी प्रयास ,
जो कोई कर दिखाये बन जाऊं मैं उसका दास।

खुद ईश्वर में जो नारी खोज ले अवगुण सभी ,
कहलाया करती है औरत पत्नी बस तभी।

मैं ईश्वर ,सब कर सकता कहता है ज़माना ,
असम्भव कहते किसको ये भी था समझाना।

पत्नी नाम सवाल का, नहीं जिसका कोई जवाब ,
भूल जाओ उसको खुश करने का मत देखो ख्वाब।

पत्नी को खुश करने वाला हुआ न कोई होगा ,
चार युगों में सम्भव नहीं , पांचवां वो युग होगा। 

No comments: