Sunday, 3 March 2013

बहुत है आरती हमने उतारी ( हास्य व्यंग्य कविता ) 1 4 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

बहुत है आरती हमने उतारी - ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बहुत है आरती हमने उतारी ,
नहीं सुनता वो लेकिन अब हमारी।

जमा कर ली उसने दौलतें  खुद ,
धर्म का हो गया वो है व्योपारी।

तरस खाता गरीबों पर नहीं वो ,
अमीरों से हुई उसकी भी यारी।

रहे उलझे हम सही गलत में ,
क्या उसको याद हैं बातें ये सारी।

कहां है न्याय उसका बताओ ,
उसी के भक्त कितने अनाचारी।

सब देखता , करता नहीं कुछ ,
न जाने लगी कैसी उसको बिमारी।

चलो हम भी तौर अपना बदलें ,
आएगी तभी हम सब की बारी।

बिना अपने नहीं वजूद उसका ,
गाती थी भजन माता हमारी।

उसे इबादत से खुदा था बनाया ,
पड़ेगी उसको ज़रूरत अब हमारी।

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