Friday, 1 March 2013

असली नकली चेहरे ( हास्य व्यंग्य कविता ) 1 3 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

असली-नकली चेहरे ( हास्य व्यंग्य कविता ) लोक सेतिया

आज बदली- बदली लगती है उनकी चाल ,
आये हैं पास मेरे दिखलाने को इक कमाल ,
दोगुना दिला सकते हैं मुझको किराया ,
सरकारी बैंक के बन कर खुद ही दलाल।

दूर कर सकते हैं हर इक राह की बाधा ,
पूछने आये हैं हमसे क्या हमारा इरादा ,
समझा रहे हैं सारा गणित सरकारी ,
करवा देंगे काम ये है पक्का वादा।

बस देनी पड़ेगी रिश्वत काम कराने को ,
कुछ हिस्सा उनका ,कुछ औरों को खिलाने को ,
आये  हैं आज गंगा उलटी बहाने पर  ,
उन्हें आना चाहिये था भ्रष्टाचार मिटाने को।

हमने पूछा क्या वही हैं आप सरकार ,
बने हुए थे सचाई के जो कल पैरोकार ,
किसी नाम की पहनी हुई थी सफेद टोपी ,
कहते थे मिटाना है इस देश से भ्रष्टाचार।

बोले हो तुम बड़े नासमझ मेरे यार ,
हम दलालों का यही रहा है कारोबार ,
फालतू है इमानदारी का फतूर ,
निकाल उसे भेजे से और  दे गोली मार।

वो भाषण ,वो नारे ,जलूस में जाना ,
शोहरत पाने का था बस इक बहाना ,
भ्रष्टाचार मिटाना नहीं मकसद अपना ,
हमने तो सीखा है खाना और खिलाना।

छोड़ो बाकी सारी बातें ,सब भूल जाने दो ,
कमा लो कुछ खुद, कुछ हमको कमाने दो ,
सीख लो हमसे कैसे करते हैं अच्छी कमाई ,
खाओ खुद ,खाने दो, उनको भी खिलाने दो।

कहानी पूरी जब किसी को थी सुनाई ,
उनकी सूरत है कैसी तब समझ में आई।

सुनकर बात उनके मुहं में आया पानी ,
हमको मिलवाओ उनसे होगी मेहरबानी ,
मंज़ूर है करना मुझे ऐसा अनुबंध भी ,
क्यों करें नये युग में बातें भला पुरानी।

क्या बतायें हैं कौन वो क्या उनका कारोबार ,
दुनिया कहती है उनको ही सच के पहरेदार। 

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