Sunday, 31 March 2013

ग़ज़ल 1 9 0 ( खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ) - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ,
हो जीना मौत से बदतर ,न इतनी बेबसी देता।

मुहब्बत दे नहीं सकते अगर ,नफरत नहीं करना ,
यही मांगा सभी से था ,नहीं कोई यही देता।

नहीं कोई भी मज़हब था ,मगर करता इबादत था ,
बनाकर कश्तियां बच्चों को हर दिन कागज़ी देता।

कहीं दिन तक अंधेरे और रातें तक कहीं रौशन ,
शिकायत बस यही करनी, सभी को रौशनी देता।

हसीनों पर नहीं मरते ,मुहब्बत वतन से करते ,
लुटा जां देश पर आते ,वो ऐसी आशिकी देता।

हमें इक बूंद मिल जाती ,हमारी प्यास बुझ जाती ,
थी शीशे में बची जितनी ,पिला हमको वही देता।

कभी कांटा चुभे ऐसा ,छलकने अश्क लग जाएं ,
चले आना यहां "तनहा" है फूलों सी नमी देता। 

Thursday, 28 March 2013

ग़ज़ल 1 8 9 ( मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल ) - लोक सेतिया "तनहा"

मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल - लोक सेतिया "तनहा"

मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल ,
कहां संभला ,संभाले से किसी का दिल।

भुला बैठा , तुम्हारी बेवफ़ाई जो ,
हुआ बर्बाद फिर फिर बस उसी का दिल।

तुम्हें दिल दे दिया हमने , तुम्हारा है ,
नहीं समझो उसे तुम अजनबी का दिल।

मनाया लाख इस दिल को नहीं माना ,
लगा लगने पराया सा कभी का दिल।

हुए थे पार कितने तीर उस दिल से ,
मिला इक दिन मुहब्बत की परी का दिल।

बहाये अश्क दोनों ने बहुत मिलकर  ,
मिला जब ज़िंदगी से ज़िंदगी का दिल।

किसी की इक झलक आई नज़र तनहा ,
बड़ा बेचैन रहता है तभी का दिल। 

Tuesday, 26 March 2013

ऐसी होली फिर से आये ( कविता ) 8 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ऐसी होली फिर से आये ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

एक घर है , बहुत प्यारा हमारा ,
कोई अकेला नहीं न है बेसहारा ,
खुला है आंगन , दिल भी खुले हैं ,
और ऊपर बना हुआ इक चौबारा।

मिल जुल खेलते सारे हैं होली ,
है मीठी कितनी लगती घर की बोली ,
पड़ा झूला भी अंगने के पेड़ पर इक ,
भैया भाभी सभी की भाती ठिठोली।

गांव सारा लगे अपना सभी को ,
चाचा चाची ,मौसी नानी ,सहेली ,
सभी को आज जा कर मिलना ,
मनानी है सभी के संग ये होली।

सभी अपने लोग, घर सब अपने ,
खिलाते हैं खुद बना घर की मिठाई ,
गिला शिकवा था गर भुलाकर ,
लगे फिर से गले बन भाई भाई।

प्यार से रंग उसको भी लगाया ,
हमारा रंग खूब उसको था भाया ,
शरमा गई सुन प्यार की बात ,
सर हां में लेकिन उसने झुकाया।

नहीं झूठ ,न छल कपट किसी में ,
जो कहता कोई सब मान लेते ,
मिलजुल कर बना लेते सभी काम ,
हो जाता जो मिलकर के ठान लेते।

कभी फिर से वही पहले सी होली ,
आ जाये कभी यही सपना है देखा ,
हटी हो आंगन की सभी दिवारें ,
मिटे हर मन में खिंची हुई रेखा।

Sunday, 24 March 2013

ग़ज़ल 1 8 8 ( रोज़ इक ख्वाब मुझको आता है ) - लोक सेतिया "तनहा"

रोज़ इक ख्वाब मुझको आता है - लोक सेतिया "तनहा"

रोज़ इक ख़्वाब मुझको आता है ,
जो लिखूं मिट वो खुद ही जाता है।

कौन जाने कि उसपे क्या गुज़री  ,
दोस्त दुश्मन को जब बताता है।

आ गया फिर वही महीना जब   ,
दिल किसी का किसी पे आता है।

बस यही हर गरीब कर सकता ,
अश्क पीता है , ज़हर खाता है।

सिर्फ मतलब के रह गये रिश्ते  ,
क्या किसी का किसी से नाता है।

एक दुनिया नयी बसानी है   ,
ख़्वाब झूठे हमें दिखाता है।

बात तनहा अजीब कहता है  ,
मौत को ज़िंदगी बताता है। 

Friday, 22 March 2013

ग़ज़ल 1 8 7 ( हमें खुद से शिकायत क्या करें हम ) - लोक सेतिया "तनहा"

हमें खुद से शिकायत क्या करें हम - लोक सेतिया "तनहा"

हमें खुद से शिकायत क्या करें हम ,
है चुप रहने की आदत क्या करें हम।

बड़े मगरूर देखे हुस्न वाले ,
किसी से फिर मुहब्बत क्या करें हम।

लिखे हर दिन नहीं भेजे किसी को ,
जला डाले सभी ख़त क्या करें हम।

हमारा जुर्म बोला सच हमेशा ,
मिली ज़िल्लत ही ज़िल्लत क्या करें हम।

बहुत तनहाईयां लाती है दौलत ,
ज़माने भर की दौलत क्या करें हम।

बड़ा है शहर लेकिन लोग छोटे ,
हमें लगती है आफ़त क्या करें हम।

ये दिल उनको नहीं देना था तनहा ,
लगी भोली वो सूरत क्या करें हम। 

Wednesday, 20 March 2013

होगा संभव पांचवें युग में ( हास्य व्यंग्य कविता ) 1 5 भाग तीन

होगा संभव पांचवें युग में ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

मिल कर सभी देवता गये प्रभु के पास ,
सोच सोच कर जब हुए देवगण उदास।

कैसे खुश हों उनकी पत्नियां ,समझ नहीं आता ,
सफल कभी न हो पाए किए कई प्रयास।

जाकर किया प्रभु से अपना वही सवाल ,
बतलाओ प्रभु हो जाये ये हमसे कमाल।

सब है देव पत्नियों को मिलता , नहीं प्रसन्न कोई ,
पूरी कर पाते नहीं  , देव तक उनकी आस।

विनती सुन देवों की प्रभु को समझ न आया ,
कोई भी हल समस्या का जाता नहीं बताया।

सुनो देवो बात मेरी , सारे दे कर ध्यान ,
बदल नहीं सकता कोई विधि का कभी विधान।

जो खुश पत्नी को कर सकता , वो होगा कोई महान ,
सच मानो नहीं कर पाया ये मैं , खुद भगवान।

असम्भव कार्य है करना मत कभी भी प्रयास ,
जो कोई कर दिखाये बन जाऊं मैं उसका दास।

खुद ईश्वर में जो नारी खोज ले अवगुण सभी ,
कहलाया करती है औरत पत्नी बस तभी।

मैं ईश्वर ,सब कर सकता कहता है ज़माना ,
असम्भव कहते किसको ये भी था समझाना।

पत्नी नाम सवाल का, नहीं जिसका कोई जवाब ,
भूल जाओ उसको खुश करने का मत देखो ख्वाब।

पत्नी को खुश करने वाला हुआ न कोई होगा ,
चार युगों में सम्भव नहीं , पांचवां वो युग होगा। 

Tuesday, 19 March 2013

ग़ज़ल 1 8 6 ( ये कैसे समझदार होने लगे सब ) - लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे समझदार होने लगे सब - लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे  समझदार   होने लगे सब ,
दिया छोड़ हंसना , हैं  रोने लगे सब।

लगे प्यार करने , समझ कर तिजारत ,
जो पाया था , उसको भी खोने लगे सब।

किसी पर कभी तुम भरोसा न करना ,
नहीं अब बचाते ,  डुबोने लगे सब।

जिन्हें मुझसे सुननी थी मेरी कहानी ,
सुनाता रहा मैं , वो सोने लगे सब।

सभी आसमां के चमकते सितारे ,
हमें  दुल्हनों के बिछौने लगे सब।

किया रोज़ दावा , कभी हम न रोते ,
मिला ज़ख्म ,पलकें भिगोने लगे सब।

भुला कर मुहब्बत , मिला क्या है "तनहा" ,
यहां फूल तक शूल होने लगे सब।

Monday, 18 March 2013

चले जा रहा ( कविता ) 8 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 चले जा रहा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मंज़िल है किधर ,
मैं किधर जा रहा हूं ,
नहीं जानता कुछ ,
पर चले जा रहा हूं ,
मैं चले जा रहा हूं।

जानता हूं लेकिन ,
अनजान बन गया हूं ,
किसे कहूं ,
कैसे कहूं ,
विवशता अपनी ,
विडंबना कैसी ,
बताउं मैं किसको ,
जाना है उधर  ,
और मैं इधर जा रहा हूं।

मालूम सब मुझे ,
क्या क्या क्यों है करना ,
पर अपने आप को ,
स्वयं ही बस छले जा रहा हूं।

सोचता नहीं हूं ,
क्यों किधर जा रहा हूं ,
चले जा रहा ,
बस चले ही जा रहा हूं।

ज़रूरी है करना ,
करने की है चाह भी  ,
करना तो होगा मुझको ,
सबह शाम खुद से ,
कहे जा रहा हूं।
चले जा रहा हूं।
 
करता रहा वही सब अभी तक ,
जो जो नहीं था करना ,
किया था कल भी ,
आज भी किये जा रहा हूं  ,
नहीं करूंगा सोचकर ,
खुद ही मुकर रहा हूं।

फिर किये जा रहा हूं।
मैं चले जा रहा हूं। 
सब है वही पुराना ,
कुछ भी नया नहीं है .
अच्छा है न ही बुरा है ,
समय  बचा नहीं है ,
बर्बाद वक़्त अपना ,
किये जा रहा रहा हूं ,
जीते नहीं हैं जैसे ,
जी रहा हूं मैं  ऐसे ,
खुद से और होता  ,
परे जा रहा हूं।

चले जा रहा हूं ,
बस चले जा रहा हूं। 

Friday, 15 March 2013

ग़ज़ल 1 8 5 ( जमाना झूठ कहता है जमाने का है क्या कहना ) - लोक सेतिया "तनहा"

ज़माना झूठ कहता है  ज़माने का है क्या कहना- लोक सेतिया "तनहा"

ज़माना झूठ कहता है , ज़माने का है क्या कहना ,
तुम्हें खुद तय ये करना है , किसे क्यों कर खुदा कहना।

जहां सूरज न उगता हो , जहां चंदा न उगता हो ,
वहां करता उजाला जो , उसे जलता दिया कहना।

नहीं कोई भी हक देंगे , तुम्हें खैरात बस देंगे ,
वो देने भीख आयें जब , हमें सब मिल गया कहना।

तुम्हें ताली बजाने को , सभी नेता बुलाते हैं ,
भले कैसा लगे तुमको , तमाशा खूब था कहना।

नहीं जीना तुम्हारे बिन , कहा उसने हमें इक दिन ,
उसे चाहा नहीं लेकिन , मुहब्बत है पड़ा कहना।

हमें इल्ज़ाम हर मंज़ूर होगा , आपका लेकिन ,
मेरी मज़बूरियां समझो अगर , मत बेवफ़ा कहना।

हमेशा बस यही मांगा , तुम्हें खुशियां मिलें "तनहा" ,
हुई पूरी तुम्हारे साथ मांगी ,  हर दुआ कहना। 

Thursday, 14 March 2013

ग़ज़ल 1 8 4 ( उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं )

 उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं - लोक सेतिया "तनहा"

उसी मोड़ पर आप हम फिर मिले हैं ,
जहां ख़त्म होते सभी के गिले हैं।

है रस्ता वही और मंज़िल वही है ,
मुसाफिर नये ,कुछ नये काफ़िले हैं।

मिले रोज़ कांटे जिन्हें नफरतों से , 
हुआ प्यार जब फूल कितने खिले हैं।

नया दौर कहता मुझे प्यार करना ,
सदा टूटते सब पुराने किले हैं।

नहीं घास को कुछ हुआ आंधियों में  ,
जो ऊंचे शजर थे , वो जड़ तक हिले हैं।

मुहब्बत में मिलती रहेंगी सजायें  ,
रुके कब भला इश्क के सिलसिले हैं।

कहा आज उसने कहो कुछ तो "तनहा" ,
था कहना बहुत कुछ , मगर लब सिले हैं।

Monday, 11 March 2013

ग़ज़ल 1 8 3 ( कहीं दिल के है पास लगता है ) - लोक सेतिया "तनहा"

कहीं दिल के है पास लगता है - लोक सेतिया "तनहा"

कहीं दिल के है पास लगता है ,
ये दिल फिर क्यों उदास लगता है।

बहुत प्यासा , उसे पिला देना ,
समुन्दर की वो प्यास लगता है।

अंधेरी रात जब भी आती है ,
वही मुखड़ा उजास लगता है।

जिसे ख़बरों में आ गया रहना ,
ज़माने भर को ख़ास लगता है।

न तो चन्दरमुखी , न है पारो ,
अकेला देवदास लगता है।

उसे तोड़ा बहुत ज़माने ने ,
नहीं टूटी है आस लगता है।

हुये जब दूर चार दिन "तनहा"  ,
हमें इक दिन भी मास लगता है। 

Saturday, 9 March 2013

ग़ज़ल 1 8 2 ( बात हर इक छुपाने लगा मैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

बात हर इक छुपाने लगा मैं - लोक सेतिया "तनहा"

बात हर इक छुपाने लगा मैं ,
कुछ हुआ ,कुछ बताने लगा मैं।

देखकर जल गये लोग कितने ,
जब कभी मुस्कुराने लगा मैं।

सब पुरानी भुलाकर के बातें ,
दिल किसी से लगाने लगा मैं।

मयकदे से पिये बिन हूं लौटा ,
किसलिये  डगमगाने लगा मैं।

बात करने लगे दिलजलों की ,
फिर उन्हें याद आने लगा मैं।

बेवफ़ा खुद मिलाता है नज़रें ,
और नज़रें झुकाने लगा मैं।

ख़त जलाकर सभी आज "तनहा" ,
हर निशां तक मिटाने लगा मैं। 

Thursday, 7 March 2013

खामोशी का आलम ( कविता ) 8 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ख़ामोशी का आलम ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कुछ भी नहीं है पास ,
पाना चाहता भी नहीं ,
अब कुछ भी ,

नहीं है अपना ,
दुनिया भर में कोई ,
अकेला भी नहीं हूं मैं ,

खोने का नहीं ग़म भी बाकी ,
पाने की तम्मना अब नहीं है ,
न चाहत है जीने की मुझको ,

नहीं मांगनी दुआ भी मौत की ,
कोई शिकवा गिला नहीं लेकिन ,
किसी से नहीं अपनापन कोई ,

अकेला हूं न महफ़िल है ,
न राह कोई न कोई भी मंज़िल है ,
नहीं भूला मुझे कुछ भी ,

नहीं याद अपनी कहानी भी मुझको ,
कहीं कोई नहीं है अपना खुदा ,
नहीं रहता मैं दुनिया में भी ,

किसी से प्यार नहीं दिल में ,
नहीं मन में नफरत का निशां ,
सभी एहसास मर चुके जब ,

समाप्त हर संवेदना हुई जैसे ,
खामोशी का है आलम ,
नहीं कुछ भी अब मुझे कहना है ,

मत पूछना कोई कुछ मुझसे ,
कहूं क्या ,
बचा क्या है कहने को। 

Tuesday, 5 March 2013

ग़ज़ल 1 8 1 ( तुम्हारा सभी से बड़ा दोस्ताना ) - लोक सेतिया "तनहा"

तुम्हारा सभी से बड़ा दोस्ताना - लोक सेतिया "तनहा"

तुम्हारा सभी से बड़ा दोस्ताना ,
किसी रोज़ मिलने हमें भी तो आना।

हुई भूल कैसी ,जुदा हो गये हम ,
थे जब साथ दोनों समां था सुहाना।

यही इश्क होता है , मिलने को उनसे ,
बिना नाखुदा के नदी पार जाना।

निराली हैं कितनी अदाएं तुम्हारी ,
हमें देखना , हम से नज़रें चुराना।

कहा था मेरा हाथ हाथों में लेकर ,
किया आपने क्या ,पड़ा दिल लगाना।

हमें चांद तारों से मतलब नहीं था ,
उन्हें देखने का था बस इक बहाना।

महीवाल सोहनी मिले आज फिर से ,
हुआ प्यार "तनहा" कभी क्या पुराना।

Sunday, 3 March 2013

बहुत है आरती हमने उतारी ( हास्य व्यंग्य कविता ) 1 4 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

बहुत है आरती हमने उतारी - ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बहुत है आरती हमने उतारी ,
नहीं सुनता वो लेकिन अब हमारी।

जमा कर ली उसने दौलतें  खुद ,
धर्म का हो गया वो है व्योपारी।

तरस खाता गरीबों पर नहीं वो ,
अमीरों से हुई उसकी भी यारी।

रहे उलझे हम सही गलत में ,
क्या उसको याद हैं बातें ये सारी।

कहां है न्याय उसका बताओ ,
उसी के भक्त कितने अनाचारी।

सब देखता , करता नहीं कुछ ,
न जाने लगी कैसी उसको बिमारी।

चलो हम भी तौर अपना बदलें ,
आएगी तभी हम सब की बारी।

बिना अपने नहीं वजूद उसका ,
गाती थी भजन माता हमारी।

उसे इबादत से खुदा था बनाया ,
पड़ेगी उसको ज़रूरत अब हमारी।

Saturday, 2 March 2013

ग़ज़ल 1 8 0 ( सब कहीं सर झुकाना न आया )

सब कहीं सर झुकाना न आया - लोक सेतिया "तनहा"

सब कहीं सर झुकाना न आया ,
हर खुदा को मनाना न आया।

हम वफ़ाएं निभाते हमेशा  ,
बात झूठी बनाना न आया।

लोग जीने लगें ज़िंदगी को ,
हाय क्यों वो ज़माना न आया।

प्यार उसने हमारा भुलाया ,
पर हमें कुछ भुलाना न आया।

दर्द दुनिया से सारे छुपाये  ,
बस उन्हीं से छुपाना न आया।

और कोई नहीं बीच अपने ,
इक भरोसा दिलाना न आया।

हाथ हमने बढ़ाया था "तनहा" ,
हाथ उनको मिलाना न आया।

Friday, 1 March 2013

असली नकली चेहरे ( हास्य व्यंग्य कविता ) 1 3 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

असली-नकली चेहरे ( हास्य व्यंग्य कविता ) लोक सेतिया

आज बदली- बदली लगती है उनकी चाल ,
आये हैं पास मेरे दिखलाने को इक कमाल ,
दोगुना दिला सकते हैं मुझको किराया ,
सरकारी बैंक के बन कर खुद ही दलाल।

दूर कर सकते हैं हर इक राह की बाधा ,
पूछने आये हैं हमसे क्या हमारा इरादा ,
समझा रहे हैं सारा गणित सरकारी ,
करवा देंगे काम ये है पक्का वादा।

बस देनी पड़ेगी रिश्वत काम कराने को ,
कुछ हिस्सा उनका ,कुछ औरों को खिलाने को ,
आये  हैं आज गंगा उलटी बहाने पर  ,
उन्हें आना चाहिये था भ्रष्टाचार मिटाने को।

हमने पूछा क्या वही हैं आप सरकार ,
बने हुए थे सचाई के जो कल पैरोकार ,
किसी नाम की पहनी हुई थी सफेद टोपी ,
कहते थे मिटाना है इस देश से भ्रष्टाचार।

बोले हो तुम बड़े नासमझ मेरे यार ,
हम दलालों का यही रहा है कारोबार ,
फालतू है इमानदारी का फतूर ,
निकाल उसे भेजे से और  दे गोली मार।

वो भाषण ,वो नारे ,जलूस में जाना ,
शोहरत पाने का था बस इक बहाना ,
भ्रष्टाचार मिटाना नहीं मकसद अपना ,
हमने तो सीखा है खाना और खिलाना।

छोड़ो बाकी सारी बातें ,सब भूल जाने दो ,
कमा लो कुछ खुद, कुछ हमको कमाने दो ,
सीख लो हमसे कैसे करते हैं अच्छी कमाई ,
खाओ खुद ,खाने दो, उनको भी खिलाने दो।

कहानी पूरी जब किसी को थी सुनाई ,
उनकी सूरत है कैसी तब समझ में आई।

सुनकर बात उनके मुहं में आया पानी ,
हमको मिलवाओ उनसे होगी मेहरबानी ,
मंज़ूर है करना मुझे ऐसा अनुबंध भी ,
क्यों करें नये युग में बातें भला पुरानी।

क्या बतायें हैं कौन वो क्या उनका कारोबार ,
दुनिया कहती है उनको ही सच के पहरेदार।