Saturday, 2 February 2013

प्यास प्यार की ( कविता ) 8 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कहलाते हैं बागबां भी  ,
होता है सभी कुछ  उनके पास  ,
फिर भी खिल नहीं पाते  ,
बहार के मौसम में भी ,
उनके आंगन के कुछ पौधे !
वे समझ पाते नहीं  ,
अधखिली कलिओं के दर्द को ।
नहीं जान पाते  ,
क्यों मुरझाये से रहते  हैं ,
बहार के मौसम में भी  ,
उनके लगाये पौधे ,
उनके प्यार के बिना !
सभी कहलाते हैं ,
अपने मगर ,
नहीं होता उनको ,
कोई सरोकार ,
हमारी ख़ुशी से ,
हमारी पीड़ा से।
दुनिया में मिल जाते हैं ,
दोस्त बहुत ,
मिलता नहीं वही एक ,
जो बांट सके हमारे दर्द भी ,
और खुशियां भी ,
समझ सके ,
हर परेशानी हमारी  ,
बन कर किरण आशा की  ,
दूर कर सके अंधियारा ,
जीवन से हमारे। 
घबराता है जब भी मन ,
तनहाइयों से ,
सोचते हैं तब ,
काश होता अपना भी कोई !
भागते जा रहे हैं ,
मृगतृष्णा के पीछे हम सभी ,
उन सपनों के लिये ,
जो नहीं हो पाते कभी भी पूरे।
उलझे हैं सब ,
अपनी उलझनों में ,
नहीं फुर्सत किसी को  ,
किसी के लिये भी ,
करना चाहते हैं हम  ,
अपने दिल की किसी से बातें ,
मगर मिलता नहीं कोई  ,
हमें समझने वाला।
सामने आता है ,
हम सब को नज़र  ,
प्यार का एक ,
बहता हुआ दरिया  ,
फिर भी नहीं मिलता  ,
कभी चाहने पर किसी को ,
दो बूंद भी  पानी ,
बस इतनी सी ही है  ,
अपनी तो कहानी !!      ( मेरी दास्तां है , जाने किस किस की कहानी है )

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