Wednesday, 27 February 2013

ग़ज़ल 1 7 9 ( लोग कितना मचाये हुए शोर हैं )

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ,
एक बस हम खरे और सब चोर हैं !
साथ दुनिया के चलते नहीं आप क्यों ,
लोग सब उस तरफ ,आप इस ओर हैं !
चल रही है हवा , उड़ रही ज़ुल्फ़ है ,
लो घटा छा गई ,नाचते मोर हैं !
हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे ,
मिल गई कुर्सियां और मुंहजोर हैं !
क्या हुआ है नहीं कुछ बताते हमें  ,
नम हुए किसलिए आंख के कोर हैं !
सब ये इलज़ाम हम पर लगाने लगे ,
दिल चुराया किसी का है ,चितचोर हैं !
टूट जाये अगर फिर न "तनहा" जुड़े ,
यूं नहीं खींचते प्यार की डोर हैं ! 

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