Monday, 25 February 2013

ग़ज़ल 1 7 8 ( जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना )

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ,
नहीं भूल जाना ये वादा निभाना !
लगे प्यार करने यकीनन किसी को ,
कहां उनको आता था आंसू बहाना !
तुम्हें राज़ की बात कहने लगे हैं ,
कहीं सुन न ले आज ज़ालिम ज़माना !
बनाकर नई राह चलते रहे हैं ,
नहीं आबशारों का कोई ठिकाना !
हमें देखना गांव अपना वही था ,
यहां सब नया है, नहीं कुछ पुराना !
उन्हें घर बुलाते, थी हसरत हमारी ,
कसम दे गये, अब हमें मत बुलाना !
मिले ज़िंदगी गर किसी रोज़ "तनहा" ,
मनाकर के लाना , हमें भी मिलाना !

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