Saturday, 23 February 2013

ग़ज़ल 1 7 7 ( नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है )

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है , 
रौशनी समझे जिसे सब ,तीरगी है !
सांस लेना तक हुआ मुश्किल यहां पर,
इस तरह जीना भी कोई ज़िंदगी है !
सब कहीं आते नज़र हमको वही हैं ,
आग उनके इश्क की ऐसी लगी है !
कह दिया कैसे नहीं कोई किसी का ,
तोड़ दिल देती तुम्हारी दिल्लगी है !
पौंछते हैं हाथ से आंसू किसी के  ,
और हो जाती हमारी  बंदगी है  !
सब हसीनों की अदाओं पर हैं मरते , 
भा गई मुझको तुम्हारी सादगी है !
मयकदा सारा हमें "तनहा" पिला दो ,
आज फिर से प्यास पीने की जगी है !

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