Wednesday, 20 February 2013

ग़ज़ल 1 7 5 ( ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना ) - लोक सेतिया "तनहा"

ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना - लोक सेतिया "तनहा"

ज़रा सोचना ,सोचकर फिर बताना ,
हुआ है किसी का ,कभी भी ज़माना।

इसी को तो कहते सभी लोग फैशन ,
यही कल नया था ,हुआ अब पुराना।

उसी को पता है ,किया इश्क़ जिसने ,
कि होता है कैसा ये मौसम सुहाना।

मेरी कब्र इक दिन बनेगी वहीं पर ,
मुझे घर जहां पर कभी था बनाना।

सभी दोस्त आए बचाने हमें थे ,
लगाते रहे पर हमीं पर निशाना।

उठा दर्द सीने में फिर से वही है ,
वही धुन हमें आज फिर तुम सुनाना।

रहा सोचता रात भर आज "तनहा" ,
है रूठा हुआ कौन , किसने मनाना।

No comments: