Wednesday, 20 February 2013

ग़ज़ल 1 7 5 ( ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना )

ज़रा सोचना ,सोचकर फिर बताना ,
हुआ है किसी का ,कभी भी ज़माना !
इसी को तो कहते सभी लोग फैशन ,
यही कल नया था ,हुआ अब पुराना !
उसी को पता है ,किया इश्क़ जिसने ,
कि होता है कैसा ये मौसम सुहाना !
मेरी कब्र इक दिन बनेगी वहीं पर ,
मुझे घर जहां पर कभी था बनाना !
सभी दोस्त आए बचाने हमें थे ,
लगाते रहे पर हमीं पर निशाना !
उठा दर्द सीने में फिर से वही है ,
वही धुन हमें आज फिर तुम सुनाना !
रहा सोचता रात भर आज "तनहा" ,
है रूठा हुआ कौन ,किसने मनाना !

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