Tuesday, 12 February 2013

ग़ज़ल 1 7 3 ( कुछ भी कहते नहीं नसीबों को )

कुछ भी कहते नहीं नसीबों को ,
चूम लेते हैं खुद सलीबों को !
तोड़ सब सरहदें ज़माने की ,
दफ़न कर दो कहीं ज़रीबों को !
दर्द औरों के देख रोते हैं ,
लोग समझे कहां अदीबों को !
आज इंसानियत कहां ज़िंदा ,
सब सताते यहां गरीबों को !
इश्क की बात को छुपा लेते ,
क्यों बताते रहे रकीबों को !
लूट कर जो अमीर बन बैठे ,
आज देखा है बदनसीबों को !
क्यों किनारे मिलें उन्हें "तनहा" ,
जो डुबोते रहे हबीबों को !

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