Saturday, 2 February 2013

दो आंसू ( कविता ) 8 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हर बार मुझे ,
मिलते हैं ,
दो आंसू ,
छलकने देता नहीं ,
उन्हें पलकों से ,
क्योंकि ,
वही हैं मेरी ,
उम्र भर की ,
वफाओं का सिला !
मेरे चाहने वालों ने ,
दिया है ,
यही ईनाम ,
बार बार मुझको !
मैं जानता हूं ,
मेरे जीवन का ,
मूल्य ,
नहीं है ,
बढ़कर दो आंसुओं से  !
और किसी दिन ,
मुझे मिल जायेगी ,
अपनी ज़िंदगी की कीमत ,
जब इसी तरह कोई ,
पलकों पर संभाल कर ,
रोक  लेगा ,
अपने आंसुओं को ,
बहने नहीं देगा ,
दो आंसू  !!

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