Friday, 15 February 2013

दर्द का नाता ( कविता ) 8 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सुन कर कहानी ,
एक अजनबी की ,
अथवा पढ़कर ,
किसी लेखक की ,
कोई कहानी ,
एक काल्पनिक पात्र के दुःख में ,
छलक आते हैं ,
हमारी भी पलकों पर आंसू ।
क्योंकि याद ,
आ जाती है ,
सुनकर हमें ,
अपने जीवन के ,
उन दुखों परेशानियों की ,
जो हम नहीं कह पाये  ,
कभी किसी से ,
न ही किसी ने समझा ,
जिसको बिन बताये ही।
छिपा कर रखते हैं हम ,
अपने जिन ज़ख्मों को ,
उभर आती है इक टीस सी उनकी ,
देख कर दूसरों के ज़ख्मों को।
सुन कर किसी की दास्तां को ,
दर्द की तड़प बना देती है ,
हर किसी को हमारा अपना ,
सबसे करीबी होता है नाता  ,
इंसान से इंसान के दर्द का !!

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