Sunday, 17 February 2013

बेबस जीवन ( कविता ) 8 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

रातों को अक्सर ,
जाग जाता हूं ,
खिड़की से झांकती ,
रौशनी में ,
तलाश करता हूं ,
अपने अस्तित्व को !
सोचता हूं ,
कब छटेगा ,
मेरे जीवन से अंधकार।
होगी कब ,
मेरे लिये भी सुबह।
उम्र सारी ,
बीत जाती है  ,
देखते हुए  सपने  ,
एक सुनहरे जीवन के।
मैं भी चाहता हूं ,
पल दो पल को  ,
जीना ज़िंदगी को ,
ज़िंदगी की तरह।
कोई कभी करता  ,
मुझ से भी जी भर के प्यार  ,
बन जाता कभी कोई ,
मेरा भी अपना।
चाहता हूं अपने आप पर ,
खुद का अधिकार ,
और कब तक ,
जीना होगा मुझको ,
बन कर हर किसी का ,
सिर्फ कर्ज़दार ,
ज़िंदगी पर क्यों  ,
नहीं है मुझे ऐतबार !!

No comments: