Friday, 8 February 2013

अपने आप से साक्षास्तकार ( कविता ) 8 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हम क्या हैं ,
कौन हैं ,
कैसे हैं  ,
कभी किसी पल ,
मिलना खुद को।
हमको मिली थी ,
एक विरासत ,
प्रेम चंद ,
टैगोर ,
निराला ,
कबीर ,
और अनगिनत ,
अदीबों ,
शायरों ,
कवियों ,
समाज सुधारकों की।
हमें भी पहुंचाना था ,
उनका वही सन्देश ,
जन जन ,
तक जीवन भर ,
मगर हम सब ,
उलझ कर रह गये  ,
सिर्फ अपने आप तक हमेशा।
मानवता ,
सदभाव ,
जन कल्याण ,
समाज की ,
कुरीतियों का विरोध ,
सब महान ,
आदर्शों को छोड़ कर ,
हम करने लगे ,
आपस में टकराव।
इक दूजे को ,
नीचा दिखाने के लिये  ,
कितना गिरते गये हम ,
और भी छोटे हो गये ,
बड़ा कहलाने की ,
झूठी चाहत में।
खो बैठे बड़प्पन भी अपना ,
अनजाने में कैसे ,
क्या लिखा ,
क्यों लिखा ,
किसलिये लिखा ,
नहीं सोचते अब हम सब ,
कितनी पुस्तकें ,
कितने पुरस्कार ,
कितना नाम ,
कैसी शोहरत ,
भटक गया लेखन हमारा ,
भुला दिया कैसे हमने  ,
मकसद तक अपना।
आईना बनना था  ,
हमको तो ,
सारे ही समाज का  ,
और देख नहीं पाये ,
हम खुद अपना चेहरा तक ,
कब तक अपने आप से ,
चुराते रहेंगे  हम नज़रें ,
करनी होगी हम सब को ,
खुद से इक मुलाकात !!

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