Wednesday, 27 February 2013

ग़ज़ल 1 7 9 ( लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं - लोक सेतिया "तनहा"

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ,
एक बस हम खरे और सब चोर हैं।

साथ दुनिया के चलते नहीं आप क्यों ,
लोग सब उस तरफ , आप इस ओर हैं।

चल रही है हवा , उड़ रही ज़ुल्फ़ है ,
लो घटा छा गई ,  नाचते मोर हैं।

हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे ,
मिल गई कुर्सियां और मुंहजोर हैं।

क्या हुआ है नहीं कुछ बताते हमें  ,
नम हुए किसलिए आंख के कोर हैं।

सब ये इलज़ाम हम पर लगाने लगे ,
दिल चुराया किसी का है , चितचोर हैं।

टूट जाये अगर फिर न "तनहा" जुड़े ,
यूं नहीं खींचते , प्यार की डोर हैं।  

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