Saturday, 23 February 2013

ग़ज़ल 1 7 7 ( नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है ) - लोक सेतिया "तनहा"

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है - लोक सेतिया "तनहा"

नाम पर तहज़ीब के ,   बेहूदगी है , 
रौशनी समझे जिसे सब , तीरगी है।

सांस लेना तक हुआ मुश्किल यहां पर,
इस तरह जीना भी , कोई ज़िंदगी है।

सब कहीं आते नज़र हमको वही हैं ,
आग उनके इश्क की ऐसी लगी है।

कह दिया कैसे नहीं कोई किसी का ,
तोड़ दिल देती तुम्हारी दिल्लगी है।

पौंछते हैं हाथ से आंसू किसी के  ,
और हो जाती हमारी  बंदगी है।

सब हसीनों की अदाओं पर हैं मरते , 
भा गई मुझको तुम्हारी सादगी है।

मयकदा सारा हमें "तनहा" पिला दो ,
आज फिर से प्यास पीने की जगी है। 

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