Saturday, 16 February 2013

ग़ज़ल 1 7 4 ( तीरगी कह गई राज़ की बात है )

तीरगी कह गई राज़ की बात है - लोक सेतिया "तनहा"

तीरगी कह गई राज़ की बात है ,
बेवफ़ा वो नहीं चांदनी रात है।

लब रहे चुप मगर बात होती रही ,
इस तरह भी हुई इक मुलाकात है।

झूठ भाता नहीं ,प्यार सच से हुआ ,
मुझ में शायद छुपा एक सुकरात है।

आज ख़त में उसे लिख दिया बस यही ,
आंसुओं की यहां आज बरसात है।

हर जुमेरात करनी मुलाकात थी ,
आ भी जाओ कि आई जुमेरात है।

भूल जाना नहीं डालियो तुम मुझे ,
कह रहा शाख से टूटता पात है।

तुम मिले क्या मुझे ,मिल गई ज़िंदगी ,
दिल में "तनहा" यही आज जज़्बात है।

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