Tuesday, 12 February 2013

ग़ज़ल 1 7 3 ( कुछ भी कहते नहीं नसीबों को ) - लोक सेतिया "तनहा"

कुछ भी कहते नहीं नसीबों को - लोक सेतिया "तनहा"

कुछ भी कहते नहीं नसीबों को ,
चूम लेते हैं खुद सलीबों को।

तोड़ सब सरहदें ज़माने की ,
दफ़न कर दो कहीं ज़रीबों को।

दर्द औरों के देख रोते हैं ,
लोग समझे कहां अदीबों को।

आज इंसानियत कहां ज़िंदा ,
सब सताते यहां गरीबों को।

इश्क की बात को छुपा लेते ,
क्यों बताते रहे रकीबों को।

लूट कर जो अमीर बन बैठे ,
आज देखा है बदनसीबों को।

क्यों किनारे मिलें उन्हें "तनहा" ,
जो डुबोते रहे हबीबों को।

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