Saturday, 12 January 2013

ग़ज़ल 9 4 ( आज खारों की बात याद आई )

आज खारों की बात याद आई ,
जब बहारों की बात याद आई !
प्यास अपनी न बुझ सकी अभी तक ,
ये किनारों की बात याद आई !
आज जाने कहां वो खो गए हैं ,
जिन नज़ारों की बात याद आई !
साथ मिलके दुआ थे मांगते हम ,
उन मज़ारों की बात याद आई !
कुछ नहीं दर्द के सिवा मुहब्बत ,
ग़म के मारों की बात याद आई !
जब गुज़ारी थी जाग कर के रातें ,
चांद तारों की बात याद आई !
दूर रह कर भी पास पास होंगे ,
हमको यारों की बात याद आई !
आज देखा वतन का हाल "तनहा" ,
उनके नारों की बात याद आई !

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