Saturday, 12 January 2013

ग़ज़ल 9 2 ( किसी मेहरबां की इनायत के लिये )

किसी मेहरबां की इनायत के लिये  ,
हमें अब है जीना मुहब्बत के लिये  !
दिखाओ खुदा का हमें कोई निशां ,
चलें साथ मिलके इबादत के लिये  !
सुनाओ हमें आज अपना हाले-दिल ,
तेरे पास आए हैं उल्फत के लिये  !
नहीं मिल सका आज उनसे कुछ हमें ,
तराशे थे बुत जो अकीदत के लिये  !
नहीं पास कोई न कोई दूर है ,
यहां सब खड़े हैं तिजारत के लिये  !
किसी को नहीं पार करते नाखुदा ,
कहां आ गए लोग राहत के लिये  !
यहां क्या मिला है किसे कर के वफ़ा ,
कहां आ गए आप चाहत के लिये  !
नहीं काम कोई भी "तनहा" का यहां ,
जहां ये बना है सियासत के लिये  !

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