Sunday, 27 January 2013

ग़ज़ल 6 7 ( सच जो कहने लगा हूँ मैं )

सच जो कहने लगा हूं मैं ,
सबको लगता बुरा हूं मैं !
अब है जंज़ीर पैरों में ,
पर कभी खुद चला हूं मैं !
बंद था घर का दरवाज़ा ,
जब कभी घर गया हूं मैं !
अब सुनाओ मुझे लोरी ,
रात भर का जगा हूं मैं !
अब नहीं लौटना मुझको ,
छोड़ कर सब चला हूं मैं !
आप मत उससे मिलवाना ,
ज़िंदगी से डरा हूं मैं !
सोच कर मैं ये हैरां हूं ,
कैसे "तनहा" जिया हूं मैं !

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