Sunday, 6 January 2013

ग़ज़ल 3 9 ( हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग )

हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ,
जाने क्यूँ सच से डर गये  हैं लोग !
हमने ये भी तमाशा देखा है ,
पी के अमृत भी मर गये  हैं लोग !
शहर लगता है आज वीराना ,
कौन जाने किधर गये  हैं लोग !
फूल गुलशन में अब नहीं खिलते ,
ज़ुल्म कुछ ऐसा कर गये  हैं लोग !
ये मरुस्थल की मृगतृष्णा है ,
पानी पीने जिधर गये हैं लोग !

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