Thursday, 10 January 2013

ग़ज़ल 118 ( रुलाता सब जमाना है , हमें रोना नहीं आता )

रुलाता सब ज़माना है ,हमें रोना नहीं आता ,
हमें अश्कों से अपने दर्द सब धोना नहीं आता !
सिखा जाना कभी आकर दिलों को जीतते कैसे ,
हमें सब और है आता ,यही टोना नहीं आता !
बढ़ाते जा रहे हैं सब कतारें खुद गुनाहों की ,
न बांधो पाप की गठड़ी अगर ढोना नहीं आता !
यहां पर आंधियां चलती बहुत ज़ालिम ज़माने की ,
तुम्हें लेकिन संभल कर खुद खड़े होना नहीं आता !
सभी कांटे हमें देना , उन्हीं को फूल दे देना ,
ख़ुशी का बीज जीवन में ,जिन्हें बोना नहीं आता !
हमेशा मांगते रहते ,मगर कैसे मिले कुछ भी ,
जिन्हें पाना तो आता है ,मगर खोना नहीं आता !
चले आये हैं महफ़िल में ,बिताने रात इक अपनी ,
अकेले रात भर "तनहा" हमें सोना नहीं आता !

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