Friday, 4 January 2013

ग़ज़ल 1 7 1 ( खुद को कितना तबाह कर बैठे )

खुद को कितना तबाह कर बैठे ,
हम ये कैसा गुनाह कर बैठे !
कर रही ज़िंदगी यही शिकवा ,
क्यों उसे हम फनाह कर बैठे !
देखकर आपके सितम हम पर ,
आज दुश्मन भी आह कर बैठे !
उनके आने से जम गई महफ़िल ,
उस तरफ सब निगाह कर बैठे !
ग़ज़ल हमने उन्हें सुनाई थी ,
लोग सारे ही वाह कर बैठे !
दे रहा हर किसी को धोखा जो ,
तुम उसी की हो चाह कर बैठे !
राह चलता रहा वही "तनहा" ,
लोग सब और राह कर बैठे !          

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