Friday, 25 January 2013

ग़ज़ल 1 4 7 ( हमें भी है जीना , नहीं रोज़ मरना )

हमें भी है जीना ,नहीं रोज़ मरना ,
ज़माना करे अब उसे जो है करना !
सियासत तुम्हारी मुबारिक तुम्हीं को ,
नहीं अब हमें हुक्मरानों से डरना !
लगे झूठ को सच बताने सभी अब ,
अगर सच कहेंगे सभी को अखरना !
किनारे उन्हीं के थी पतवार उनकी ,
हमें था वहां बस भंवर में उतरना !
बुझाते कभी प्यास पूरी किसी की ,
पिलाना अगर अब सभी जाम भरना !
लुभाना पिया को सभी चाहते हैं ,
है मालूम किसको हो कैसे संवरना !
हैं दुश्मन यहां सब नहीं दोस्त कोई ,
कभी भी यहां पर न "तनहा" ठहरना ! 

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