Thursday, 24 January 2013

ग़ज़ल 1 2 7 ( दोस्त अपने हमें बुला न सके )

दोस्त अपने हमें बुला न सके ,
हम भी गैरों के पास जा न सके !
प्यार तो प्यार है इबादत है ,
पर सभी ये सबक पढ़ा न सके !
जो कभी साथ साथ गाये थे ,
हम ख़ुशी के वो गीत गा न सके !
आप करते गये सितम पे सितम ,
हम लबों तक भी बात ला न सके !
कह रहा है हमें ज़माना भी ,
सीख जीने की तुम अदा न सके !
मत कभी रूठ कर चले जाना ,
हम  किसी को कभी मना न सके !
तुम हमें दे गये कसम "तनहा" ,
अश्क हम चाह कर बहा न सके !

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