Saturday, 12 January 2013

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना
हम भी जलते रहे रौशनी के बिना।

उनसे हम बात करते भला और क्या
कुछ भी आता नहीं आशिकी के बिना।

बात महफ़िल में होने लगी होश की
कुछ न आया मज़ा बेखुदी के बिना।

जब कभी हम मिलें , उस हसीं रात में
आ भी जाना वहां , तुम घड़ी के बिना।

एक दिन  सामने   दे दिखाई खुदा
यूं ही "तनहा" मगर बंदगी के बिना।

1 comment:

Sanjaytanha said...

बहुत खूब...