Sunday, 20 January 2013

आज सोचा ( कविता ) 7 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

न सोचा कभी ,
न समझा ,
न कभी जाना ,
है बाकी रहा ,
अब तक ,
खुद को ही ,
मुझे पाना  ! !
किसलिये जीता रहा ,
मैं किसलिये मरता रहा ,
खो गया जीवन कहीं ,
क्या उम्र भर करता रहा ,
डर है भला कैसा मुझे ,
किस बात से डरता रहा ,
दुनिया में अपना कौन है ,
तलाश क्या करता रहा ।
खुद को नहीं समझा कभी ,
क्यों काम ये करता रहा ,
खड़ा रहा नदी किनारे ,
गागर को नहीं भरता रहा ,
जीने से करना प्यार था ,
पर नहीं करता रहा।
अब तो सोच ले ज़रा ,
हर पल ही तू मरता रहा ,
दिया किसे दुनिया ने क्या ,
दुनिया की बातें दे भुला ,
चलना है खुद के साथ चल ,
बस साथ अब अपना निभा ,
खुद से कर कुछ प्यार अब ,
सब दर्द दिल के मिटा।
ऐसे है जीना अब तुझे ,
रहे तेरा दामन भरा ,
कहता यही है वक़्त भी ,
न लौट कर फिर आयेगा ,
पाना हो जो पा ले अभी ,
सब कुछ तुझे मिल जाएगा !!

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