Saturday, 12 January 2013

ग़ज़ल 9 4 ( आज खारों की बात याद आई ) - लोक सेतिया "तनहा"

आज खारों की बात याद आई  - लोक सेतिया "तनहा"

आज खारों की बात याद आई ,
जब बहारों की बात याद आई।

प्यास अपनी न बुझ सकी अभी तक ,
ये किनारों की बात याद आई।

आज जाने कहां वो खो गए हैं ,
जिन नज़ारों की बात याद आई।

साथ मिलके दुआ थे मांगते हम ,
उन मज़ारों की बात याद आई।

कुछ नहीं दर्द के सिवा मुहब्बत ,
ग़म के मारों की बात याद आई।

जब गुज़ारी थी जाग कर के रातें ,
चांद तारों की बात याद आई।

दूर रह कर भी पास पास होंगे ,
हमको यारों की बात याद आई।

आज देखा वतन का हाल "तनहा" ,
उनके नारों की बात याद आई। 

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