Saturday, 12 January 2013

ग़ज़ल 8 3 ( वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ) - लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना - लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ,
हम भी जलते रहे रौशनी के बिना।

उनसे हम बात करते भला और क्या ,
कुछ भी आता नहीं आशिकी के बिना।

बात महफ़िल में होने लगी होश की ,
कुछ न आया मज़ा बेखुदी के बिना।

जब कभी हम मिलें , उस हसीं रात में ,
आ भी जाना वहां , तुम घड़ी के बिना।

एक दिन  सामने   दे दिखाई खुदा ,
यूं ही "तनहा" मगर बंदगी के बिना।

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